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हर ग्राहक को खंडवा उपभोक्ता फोर्म का ये फैसला पढना चाहिये..

खण्डवा-माताचौक खंडवा निवासी हिमांशु पिता राधेश्याम गुप्ता ने अपनी आजीविका हेतु एक बस क्रमांक एमपी 09 एफ ए 0880 पर बॉडी निर्माण हेतु चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से ₹204000 का फाइनेंस करवाया था जो प्रतिमाह ₹7600 की 35 किस्तों में फाइनेंस कंपनी को अदा किया जाना था। दिनांक 5.8.17 को स्वीकृत उक्त फाइनेंस की गई राशि ₹204000 में से परिवादी को कंपनी ने मात्र ₹142000 ही प्रदान किए शेष 48,833 रु की राशि से उक्त फाइनेंस की गई बस पर 23 सितम्बर 17 से लेकर आगामी 1 वर्ष के लिए अपनी ही बीमा कंपनी से बीमा भी कर दिया ।
इस प्रकार से फाइनेंस दिनांक से लेकर बीमा प्रारम्भ दिनांक 23 .9.17 तक सवा महीने की अवधि के दौरान उक्त फाइनेंस की गई राशि में से ₹48838 रु को बिन बीमा सेवा प्रदान कर अपने उपयोग में कम्पनी ने अपने पास रखा गया। परिवादी के अधिवक्ता देवेंद्र सिंह यादव ने बताया कि परिवादी ने कुल 7 महीने तक लगातार ₹7600 प्रति माह की अनुसार कुल ₹53200 फाइनेंस की प्रीमियम राशि जमा की और आठवें महीने में शेष फाइनेंस की गई राशि ₹150800 जमा कराना चाहिए तो फाइनेंस कंपनी के द्वारा उसे स्वीकार करने से इनकार करते हुए 183200 रु जमा करने हेतु दबाव बना कर जमा करवाये गए। इस प्रकार से फाइनेंस कंपनी ने आवेदक से ₹32400 अधिक जमा करवाएं साथ ही फाइनेंस के वक्त 13087 रु फाइलिंग चार्ज के नाम पर ले लिए एवं उक्त वाहन के बीमे के नाम पर काटी गई धन राशि ₹48838 बिना बीमा किये सवा महीने तक अपने उपयोग में कम्पनी द्वारा ली गयी। इन सब से व्यथित होकर परिवादी हिमांशु गुप्ता ने अपने अधिवक्ता देवेंद्र सिंह यादव के माध्यम से जिला उपभोक्ता फोरम के समक्ष याचिका प्रस्तुत कर न्याय की गुहार लगा कर चोलामंडलम फाइनेंस कंपनी द्वारा ₹50000 से अधिक जबरिया वसूल की गई राशि को वापस दिलाए जाने की प्रार्थना की थी। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण फोरम खंडवा की अध्यक्ष श्रीमती कनक लता सोनकर एवं सदस्य श्रीमती अंजलि जैन ने परिवादी का परिवार स्वीकार कर आज आदेश पारित किया कि अनावेदक संस्था के द्वारा कोई सेवा में कमी नहीं की गई है तो इस तथ्य को प्रमाणित करने का भार भी अनावेदक संस्था पर ही है एवं ऐसा प्रमाण भार उचित साक्ष्य प्रस्तुत करके ही उन्मोचित किया जा सकता है । केवल परिवाद के अभीकथन जो जवाब में अस्वीकृत किए गए हो वे साक्ष्य नहीं माने जा सकते एवं इनके द्वारा सेवा में कमी ना किए जाने का प्रकरण प्रमाणित नहीं हो सकता है ।

इस प्रकार संस्था के द्वारा परिवादी से प्राप्त की गई बीमा प्रीमियम राशि निर्धारित समय अवधि में जमा ना कराया जाना एवं प्राप्त की गई राशियों के संबंध में परिवादी को स्पष्टीकरण प्रदान ना कर सेवा में कमी का कृत्य अनावेदक फाइनेंस कंपनी के द्वारा किया गया है इसलिए अनावेदक फाइनेंस कंपनी के विरुद्ध यह आदेश पारित किया जाता है कि –

1 अनावेदक संस्था द्वारा परिवादी द्वारा जमा की गई राशि,फाइलिंग चार्ज की राशि एवं वास्तविक शेष ऋण राशि के संबंध में परिवादी को स्पष्ट गणना पत्रक दिया जा कर संतुष्ट किया जाएगा।

2 यदि परिवादी अनावेदक संस्था द्वारा परिवादी से फाइललिंग चार्ज व वास्तविक ऋण राशि से अधिक राशि प्राप्त की गई है तो अनावेदक संस्था द्वारा परिवादी को आदेश दिनांक 5.3.19 से आगामी 30 दिन की अवधि में अधिक प्राप्त की गई राशियों का भुगतान किया जाएगा अन्यथा उक्त राशियों पर आदेश दिनांक से अदायगी दिनांक तक 12% वार्षिक की दर से ब्याज देना होगा।

3 अनावेदक संस्था द्वारा परिवादी से बीमा प्रीमियम राशि प्राप्त किए जाने के उपरांत तत्काल वाहन का बीमा ना करने एवं ऋण राशियों के संबंध में फाइलिंग चार्ज एवं वास्तविक शेष ऋण राशि से परिवादी को अवगत ना कराए जाने से परिवादी को सेवा में कमी के कारण हुए मानसिक संत्रास हेतु ₹3000 की राशि आदेश दिनांक से 30 दिन की अवधि में अदा की जाएगी अन्यथा उक्त राशि पर आदेश दिनांक से अदायगी दिनांक तक कुल 12% वार्षिक दर से ब्याज देना होगा।

4 अनावेदक संस्था द्वारा परिवादी का परिवाद व्यय ₹2000 भी वाहन किया जा कर देना होगा। परिवादी की ओर से अधिवक्ता देवेंद्र सिंह यादव ने न्यायालय में पैरवी की।

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